परंपरागत कारोबार को नए सांचे में ढालकर वेद राम ने बनाई अलग पहचान
परंपरागत कारोबार को नए सांचे में ढालकर वेद राम ने बनाई अलग पहचान
मोहरे, नरसिंगा का स्मृति कुल्लवी बार्डर लगाकर कर रहे हैं तैयार
पीएम नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को भेंट किए जा चुके हैं उनके बनाए स्मृति चिन्ह
60 से अधिक लोगों को जोड़ा है अपने साथ, दिल्ली घाट के साथ देश की प्रदर्शनियों में लेते हैं भाग
गौरीशंकर
कुल्लू। आधुनिकता के भंवर में डूबते परंपरागत कारोबार को नए सांचे में ढालकर कुल्लू के वेद राम ने अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने अपने पूर्वजों के मोहरे, करनाल नरसिंगा बनाने के पुश्तैणी कारोबार को नया रूप दिया है। वह देवी-देवता स्वरूप के छोटे छोटे मोहरे और नरसिंगा बनाकर इसे स्मृति चिन्ह बना रहे हैं। ये स्मृति चिन्ह अब आलीशान घरों, होटलों और रेस्टोरेंट के साथ सरकारी कार्यालयों की शोभा बन रहे हैं। उनके बनाए स्मृति चिन्ह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी प्रदेश सरकार की ओर से भेंट किए जा चुके हैं। जबकि प्रदेश में होने वाले बडे़ आयोजनों में आने वाली हर शख्सियत को इस तरह के स्मृति चिन्ह देने की रिवायत भी शुरू हो गई है। ऐसे में वेद राम ने पुराने संस्कृति में नयापन लाकर इस क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं के लिए भी रोजगार की राह दिखाई है। लिहाजा, कुछ वर्षों से वीवीआईपी, वीआईपी व्यक्तियों को कार्यक्रमों के दौरान गिफ्ट के रूप प्रदान करने के उद्देश्य से इस तरह के स्मृति चिन्ह की अच्छी मांग चल रही है।
--क्या कहते हैं वेद राम
युवा वेद राम का कहना है कि वह मूलत: मंडी जिला के थाची से ताल्लुख रखते हैं और वर्तमान में कुल्लू के शिशामाटी में रहते हैं। हमारे पूर्वज पहले देवी देवताओं के मोहरे बनाने का काम करते थे। लेकिन वर्तमान में यह काम काफी कम हो गया है। ऐसे में इसमें नयापन लाना जरूरी था। जिसमें नरसिंगा, करनाल, मोहरे, ओम, स्वास्तिक आदि बनाकर इसे स्मृति चिन्ह का रूप दिया जो काफी पसंद किया जाने लगा है। लो अपने घरों, होटलों, रेस्टोरेंट की दीवारों में लगाने के लिए खरीददारी करते हैं।
--यहां लगाई प्रदर्शनी
इन स्मृति चिन्ह को हिमाचल प्रदेश में लगने वाले मेले और प्रदर्शनियों के अलावा बाहर चेन्नई, हरियाणा के हिसार सहित कई राज्यों में आयोजित प्रदर्शनियों में सजा चुके हैं। इनमें यह स्मृति चिन्ह आकर्षण का केंद्र बने रहे और दिल्ली में इसकी अच्छी खासी खरीददारी भी हुई। दो दिनों में बनने वाले एक स्मृति चिन्ह की की कीमत 35 सौ रुपए से शुरू होती है।
--यह वस्तुएं भी बना रहे
मोहरे, नरसिंगे, करनाल आदि को स्मृति चिन्ह के रूप में बनाने के साथ बड़ी करनाल, नरसिंगा, धड़च, कांसे की घंटियां, प्रशनें बनाने का भी काम कर रहे हैं। वेद राम का कहना है कि वह यह सारा कार्य निर्वाण हैंडी क्राफ्ट के माध्यम से कर रहे हैं। इस कार्य के लिए उन्होने अपने साथ 60 से अधिक और लोगों को भी जोड़ा है और उन्हें भी रोजगार मिल रहा है।
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